कविता: मेरे देश की बेटी

मेरे देश की बेटी हार गयी,
मेरे देश की बेटी हार गयी,
मेरे देश का बाहुबल जीत गया।

संस्कृति शर्मा
Sanskriti Sharma

कमजोर का दिल था,
गरीब की चौखट थी,
उम्मीदों की खुशामद थी,
एक और बाप का सर पिट गया।

मेरे देश की बेटी हार गयी,
मेरे देश की बेटी हार गयी,
मेरे देश का बाहुबल जीत गया।

उन्नाव, जहाँ उसने,
उड़ान भारी थी अपनी कभी।

किसी वशही दरिन्दे का,
हैवानियत भरा दिल,
उसके हौसलों को खींच गया,
उसके माँ-बाप, सगे-सम्बन्धी,
सभी दौलत कि भट्टी मे झोक दिए।

उसके जो अवशेष बचे,
वो दोहरी मानसिकता ने फूंक दिए ,
वो मर गयी, खप गयी,
और देश का विकास जीत गया।

वो एक बेटा था,
किसी औरत का,
जिसका लहू,
किसी औरत का,
जबड़ा भींच गया।

मेरे देश की बेटी हार गयी,
मेरे देश की बेटी हार गयी,
मेरे देश का बाहुबल जीत गया,
यह मौत उसकी नहीं,
हम सबकी है,
हमारी खोखली संस्कृति की है।

हममें मर चुकी उस इंसानियत कि है,
जिसका सुर्खर लहू,
नीरा कोरा निपट सफ़ेद हो चुका है,
जो खुद कटने पर भी,
उबलेगा या अपनी किसी,
स्वार्थ पिपासा मे खुद मे ही,
जर्द हो जायेगा।

हम खुद के हक के लिये,
कभी लड़े नहीं,
क्यों लड़ेंगे तेरे हक के लिए,
ऐसे भयानक खबर पर,
हम अख़बार का पन्ना पलट डालते है।

मेरे देश की बेटी हार गयी,
मेरे देश की बेटी हार गयी,
मेरे देश का बाहुबल जीत गया।