21 फ़रवरी: पावन जन्मदिवस पर दो बातें महाकवि निराला के संबंध में

वाग्देवि के वरद पुत्र की जय हो
वरदे वीणावादिनी वरदे

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ (21 फ़रवरी, 1899 – 15 अक्टूबर 1961 ) हिन्दी कविता के छायावादी युग  के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त और महादेवी वर्मा के साथ हिंदी साहित्य में छायावाद  के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कई कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है।


विद्रोह का मतलब निराला

पगडंडियों के भरोसे चलना, परछाईं में जीवन काटना और हां मैं हां मिलाकर चलना , निस्संदेह सुखकर होता है। इसलिए अधिकतर लोग इसी राह चलते हैं, चलना चाहते हैं। लकीर के ये फ़कीर शायद ही कोई चमत्कारिक कार्य संपादित करते हैं,या फिर किसी कर्म,कृति या कार्य को सुंदर बनाने में सहायक होते हैं।
मगर लीक से हटकर चलने वाले, झंझावातों से जूझने वाले, दुःख को जीवन साथी बनाने वाले, उपहास और विरोध को हंसकर गले लगाने वाले जब कामयाब होते हैं तो नायाब होते हैं, पदचिन्ह बनाते हैं, मार्गदर्शक कहलाते हैं।
हिन्दी साहित्य के सूर्य सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पथप्रदर्शक, पदचिन्ह निर्माता और भावी पीढ़ियों के लिए खुला आकाश देने वाले युगद्रष्टा महाकवि हैं। उनका संपूर्ण कृतित्व और व्यक्तित्व उनके उपनाम की तरह अनोखा, निराला ही है।
आजीवन शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ वाणी और कर्म से जंग लड़ने वाले महाकवि को उपेक्षा और दुख पुरस्कार में मिला था। तभी तो कवि की वाणी से अन्त:करण का उद्गार व्यक्त हुआ

डॉ विजय शंकर Dr Vijay Shankar
सहायक शिक्षक
आर एल सर्राफ उच्च विद्यालय देवघर


दुःख ही जीवन की कथा रही
क्या आज कहूं जो कल नहीं कही


इस निराश ने भी कवि के मूल धर्म को सींचा तभी महाकवि ज्ञानदेवि से सभी की स्वतंत्रता की याचना कर बैठते हैं:–


वरदे वीणावादिनी वरदे

सभी प्रकार के कलुषित भावना, विचारों को दूर करने की याचना करते हैं।


प्रिय स्वतंत्र रव,अमृत मंत्र नव
भारत में भर दे

असमानता, विषमता और आडम्बर कवि को फूटी आंख नहीं सुहाता है। दरअसल रामकृष्ण परमहंस की जीव सेवा ही शिव सेवा है और स्वामी विवेकानंद के तेजोमयी वाणी का प्रभाव , पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी व्यक्तित्व और कृतित्व पर पड़ा है।
भिक्षुक कविता हम सभी ने पढ़ी है, विषमता पर इससे बड़ा प्रहार और सत्ताधारी का इससे बड़ा उपहास और क्या होगा।

       याचना से ही सबकुछ संभव नहीं है, संगठित होकर शक्ति संचय कर भीषण से भीषण दुष्ट के लिए लड़ा और जीता जा सकता है,शायद इसी शक्ति के महिमा का परिचय कराना महाकवि निराला को राम की शक्ति पूजा में अभिष्ट है।
     छायावाद के सिरमौर कवियों में शुमार महाकवि निराला ने हिन्दी साहित्य में मुक्तछंद का बिगुल बजाकर,एक विस्तृत,व्यापक आकाश का आगाज किया, जिसके लिए वे सदैव स्तुत्य रहेंगे।

अभी नहीं होगा मेरा अंत

     हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार महाप्राण निराला जी के पावन जन्मदिवस पर उनके पावन चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।।
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