कविता: जागो रे बहना

आराध्य प्रिया Aradhaya Priya

जागो रे जागो रे बहना,
पढो लिखो आगे बढ़ो रे बहना,
बहुत सो चुकी अब उठो रे बहना,

सदियों से तू सताई गयी है,
कभी सती प्रथा के चिता पर सुलाई गयी,
कभी पर्दा प्रथा कि बेड़ियों मे जकड़ी गयी,
कभी जुए के दांव पर लगाई गयी,

आज भी दहेज कि आग मे जलाई जाती है तू,
बहु रूप मे सताई जाती है तू,
डायन के नाम पे तड़पाई जाती है तू,
सरेआम बलात्कारियो का शिकार हो जाती है तू,
फिर भी अबतक सोई है तू,

बस अब ना देर करो तुम,
सम्मान से यदि जीना है तो,
कदम-कदम पर मुसीबतो से लड़ना सीखो,
करो प्रयास अंतिम सांस तक,
व्यवस्था सुधार कर,
रिक्त हो जाये ज़ब खजाना प्रयास का,
तब लक्ष्मीबाई बन इंकलाब कर दो।