हिंदुस्तान में हिंदी

हिंदी-दिवस’ पर विशेष

हिंदी में एक कवि हुए हैं रामधारी सिंह दिनकर।वे "राष्ट्रकवि" के रूप में सम्मानित हैं। हिंदी में एम ए नहीं थे। स्नातक की कक्षा में भी उनका प्रमुख विषय इतिहास था।
एक मैथिली शिक्षक के रूप में मेरा भी जीवन एक महाविद्यालय में बीता। सभी के सभी शिक्षक एम ए पास थे। मैंने महसूस किया कि एक भी शिक्षक पढ़ते नहीं हैं।वे किसी प्रश्नोत्तरी व अपनी पुरानी कॉपी से लिखा-पढ़ाकर विद्यार्थियों को पढ़ाने-लिखाने के दायित्वों का निर्वहन कर लेते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि अधिकांश अध्यापक हिन्दी में शुद्ध-शुद्ध आवेदन तक नहीं लिख पाते थे और टोकने पर बड़ी दृढ़ता से कहते कि वे हिन्दी के शिक्षक नहीं हैं।गौर करने की बात है कि हिन्दी-प्रदेश में हिन्दी के सन्दर्भ में शिक्षकों की स्थति ऐसी है।
 सामान्य रूप से हिन्दी के विद्यार्थी आमलोगों में हिन्दू विचारधारा वाले माने जाते हैं,अन्धविश्वासी,पोंगापंथी व पुराने विचारों के समझे जाते हैं। करीब-करीब शिक्षा जगत में भी इनके प्रति ऐसी हीं धारणाएं हैं। इन्हें दब्बू और समझोतावादी जाना जाता है। लोगों में हिन्दी के शिक्षकों के प्रति भी ऐसी ही मान्यताएं हैं। और मेरे जैसे लोगों को असीम दु:ख तो तब होता है जब देखता हूं कि विद्यार्थियों और शिक्षकों में इसके लिए कोई कचोट भी नहीं है। मतलब कि इसे वे कोई लांछना नहीं मानते और सहज स्वीकार करते हैं।गर्व से वे इसे भारतीयता, भारतीय परम्परा और भारतीय संस्कार की संज्ञा प्रदान करते हैं।
  साहित्य का अध्येता और अध्यापक होने के नाते,साहित्यसेवी होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगा कि हिन्दी हीं नहीं,सभी भाषा के साहित्य के अच्छे अध्येता व अध्यापक के साथ-साथ साहित्यकार होने का दावा वही कर सकते हैं,जो अपनी साहित्यानुभूति को अपने जीवन में संभव कर देते हैं। यदि वे ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उनका ज्ञान चाहे जितना बड़ा हो, अध्ययन की साधना चाहे जितनी गहरी हो, अच्छा साहित्यकार, कवि, लेखक, विद्यार्थी, अध्यापक आदि नहीं हो सकते।
 भारत सरकार द्वारा अभी-अभी नई शिक्षा नीति 2020 में एक अच्छा प्रावधान किया गया है कि आरंभिक कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होगी। राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिए यह शुभ है। इससे हिंदी-उन्नति का पथ प्रशस्त होगा। लेकिन इससे हिंदी का पूर्ण कल्याण होगा, ऐसी बात नहीं है।
मेरा मानना है कि पाठ्यक्रम बदलने से, शिक्षा-पद्धति अथवा नीति बदलने से हिंदी भाषा और साहित्य का उद्धार नहीं हो सकता है। इसके लिए समाज और सरकार को एक विशिष्ट हिंदी-चरित्र का ढांचा खड़ा करना होगा।
 भारत में आजादी प्राप्ति के बाद सर्वाधिक उपेक्षित विषय यदि कोई रहा है, तो वह शिक्षा है और उसमें भी सबसे अधिक दुर्दशा किसी को सहनी पड़ी है तो वह हमारी हिन्दी है।
    आज भारत में ही हिंदी कवियों, लेखकों का सार्वजनिक सम्मान न्यून है। गुजराती, बंगला, कन्नड़, तमिल आदि भाषासेवियों का जो सम्मान उन भाषा-भाषियों के बीच है, वह हिंदी के लिए कहां है! इसके लिए हमारा सुझाव है कि "हिंदी" का नाम " भारती" कर दिया जाय,ताकि प्रत्येक भारतीय को अहसास हो कि भारती भारत की भाषा है, भारत में रहने वाले सभी भारतवासियों की भाषा है।
सम्प्रति देश में न तो सरकार के पास और न किसी गैर सरकारी संगठनों, संस्थाओं के पास कोई ऐसी योजना है कि हिंदी का साधक हिंदी के महापुरुषों की जन्मभूमि अथवा कर्मभूमि पर पहुंच कर उनके सम्पूर्ण साहित्यिक कीर्तियों, उनके अनुवाद तथा उनपर लिखी गईं पुस्तकें अध्ययन व शोध के लिए प्राप्त कर सकें। हिंदी-दिवस के अवसर पर मैं केन्द्र और राज्य सरकारों से मांग करुंगा कि वे ऐसी व्यवस्था कराये।
अगर हिन्दी की ऐसी ही उपेक्षा होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब 'हिंदी-दिवस' किसी बार मनकर रह गया तथा समयांतराल में परम्परा विलुप्त हो गई, कोई बड़ी बात नहीं।

हम समस्त भारतीय का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहते हैं कि जो देश अपनी भाषा को भूल जाता है,उसका परिणाम यही होता है, जो आजकल हो रहा है और हम देख रहे हैं। अधिक काल तक वह अपनी अखंडता की रक्षा नहीं कर सकता।
इन सभी बिन्दुओं के परिप्रेक्ष्य में चिंतन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हिंदीसेवियों में हिन्दी के प्रति स्वत्व-दृष्टि का अभाव है। हमें लगता है कि हम वर्ष भर में एक बार 14 सितंबर को मात्र राजनीतिक ध्येय की पूर्ति के लिए ‘हिन्दी-दिवस’ मनाने की खानापूर्ति कर निश्चिंत हो जाते हैं।
अन्त में हम कहना चाहेंगे कि आवश्यकता है हमें जगने की और अपने को जगाने की। भारत है और भारती (हिंदी) के लिए समय सदा अनुकूल है। ‘हिंदी ,हिन्दू, हिन्दुस्तान’ के नारे के साथ सत्ता में आने वाली भाजपा की सरकार सत्ता के मद में हिन्दी से किये अपने वादे को परे करने में थोड़ी शिथिलता दिखा रही है।हम हिन्दीप्रेमियों का यह दायित्व और कर्त्तव्य दोनों बनता है कि स्वत्व और प्रेम की थपकी से राष्ट्र और सरकार को जगाकर हिंदी के प्रति उनके दायित्वों का उन्हें अहसास करायें। यदि हम ऐसा कर सकें तो हमें विश्वास है कि देखते-ही-देखते हिंदी देश की हवा में रम जायेगी। हिंदी अपने साहित्य के साथ एक नई शक्ति तथा स्फूर्ति का संदेशवाहक बन जायेगी और हमें अपने इतिहास,अपनी सभ्यता-संस्कृति, राष्ट्रीय विचारधारा एवं जागृति का अनुभव होगा।जय हिंदी। जय भारती!!

डॉ. परमानन्द लाभ Dr. Parmanand labh शिक्षाविद्, समस्तीपुर


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